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गर्भावस्था में शुगर का स्तर अधिक व नशा करने से भी जन्म के समय शिशु में हृदय रोगों की आशंका

कंजेनाइटल हार्ट डिजीज (सीएचडी), एक प्रकार की जन्मजात हृदय की बीमारी है। इसमें जन्म लेते ही शिशु के हृदय में असामान्यता होती है। इसमें खून का बहाव सही नहीं रहता है। दिल की दीवारों, वॉल्व और खून की नलियों में दिक्कत हो जाती है। समय पर उपचार न मिलने पर हर साल भारत में लगभग 10त्न बच्चे जान गवां देते हैं। 14 फरवरी को कंजेनाइटल हार्ट डिजीज जागरूकता दिवस मनाते हैं।
संक्रमण भी कारण
सीएचडी में अनुवांशिकता एक प्रमुख वजह है। लेकिन गर्भावस्था में किसी दवा, नशा करने, प्रेग्नेंसी की पहली तिमाही में मां को वायरल इंफेक्शन (रुबेला वायरस) होने, गर्भावस्था में मां का शुगर लेवल अधिक होने से भी भ्रूण का विकास प्रभावित होता और सीएचडी हो सकता है। हार्ट डिजीज की फैमिली हिस्ट्री में सावधानी रखें।
जन्म के समय शिशु की स्क्रीनिंग जरूरी
जन्म के समय बच्चों की न्यू बॉर्न स्क्रीनिंग की जानी चाहिए। इससे बीमारी का पता किया जा सकता है। क्रिटिकल सीएचडी स्क्रीनिंग पद्धति से पल्स ऑक्सीमीटर की मदद से खून में हीमोग्लोबिन का स्तर और स्किन सेंसर से इसका पता लगा लेते हैं। जरूरी होने पर ईसीजी आदि कराते हैं।
सीएचडी है तो छिपाएं नहीं, जागरूक बनें
अगर शिशु को यह बीमारी है तो छिपाएं नहीं, बल्कि जरूरी लोगों को अवश्य बताएं। यह कोई दिव्यांगता नहीं है। केवल दिल कमजोर होता है। बच्चा दिमाग से सामान्य होता है। दूसरों को इसकी जानकारी होती है तो जरूरत पडऩे पर मदद मिल जाती है।
ज्यादातर बच्चों में बीमारी बढ़ती उम्र के साथ ठीक हो जाती
इसका इलाज बीमारी केप्रकार और गंभीरता पर निर्भर करता है। कुछ बच्चों में हृदय विकार कम गंभीर होते हैं जो समय के साथ अपने आप ही ठीक हो जाते हैं। वहीं, कुछ बच्चों में गंभीर विकार हो सकता है जिसे तुरंत इलाज की जरूरत होती है। कई ऐसी दवाइयां हैं जिनकी मदद से हृदय को बेहतर तरीके से काम करने में मदद की जा सकती है। कुछ दवाओं का इस्तेमाल खून के थक्के बनने से रोकने या अनियमित धडकऩ को नियंत्रित करने में किया जा सकता है।
इंप्लांटेबल हार्ट डिवाइस: पेसमेकर और इंप्लांटेबल कार्डियोवर्टर डिफेब्रिलेटर्स (आइसीडी) जैसे डिवाइसों की मदद से भी इसको ठीक किया जाता है। इससे धडकऩें सामान्य हो जाती हैं।
नई तकनीक: कैथेटर प्रक्रिया से भी इलाज होता है। यदि कैथेटर तकनीक काम नहीं करती है तो ओपन हार्ट सर्जरी की जाती है। इसमें हृदय के छेदों को बंद, हार्ट वॉल्व को ठीक या रक्त वाहिकाओं को चौड़ा करते हैं। कुछ गंभीर मामलों में हार्ट ट्रांसप्लांट करने की भी जरूरत पड़ती है।



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