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सेहत जिंदगी: क्या ब्रेकिंग न्यूज सुनकर आप को बेचैनी होती है? अगर हां तो यह हो सकता है 'हैडलाइन स्ट्रैस डिस्ऑर्डर'

टीवी पर दिखाई जाने वाली बहस (TV Debates), समसामयिक मुद्दे (Current Affairs), दुर्घटनाओं और चैनलों की ब्रेकिंग न्यूज (Breaking News) अगर आपको बेचैन और परेशान करती हें तो आपको संभलने की जरुरत है। जब भी कोई दर्दनाक घटना, कोई महामारी या अप्रिय प्राकृतिक आपदा के बारे में चैनल पर ब्रेकिंग दिखाई देती है एक खास डिस्ऑर्डर (Mentle Disorder) से पीडि़त लोग असहाय और गुस्सा दोनों महसूस करते हैं। कुछ रोने लगते हैं तो कुछ विचलित हो जाते हैं। शोधकर्ता इसे 'हैडलाइन स्ट्रैस डिस्ऑर्डर' (Headline Stress Disorder) कहते हैं। शोधकर्ता कहते हैं कि इस सिंड्रोम (Syndrome) से पीडि़त व्यक्ति लाख कोशिशों के बावजूद न्यूज चैनल और ब्रेकिंग खबरें देखना नहीं छोड़ पाते। दरअसल इस सिंड्रोमसे दुनिया भर में लाखों लोग ग्रसित हैं। डॉक्टरों की मानें तो यह मानसिक परेशानी किसी भी डीएसएम-5 (DSM-5: Diagnostic and Statistical Manual of Mental Disorders), शिजोफ्रेनिया (Schizophrenia) और बायोपोलर डिस्ऑर्डर (Biopolar Disorder) से भी जुड़ी हुई नहीं है। इसे सबसे पहले दिसंबर, 2016 में मैरीलैंड, अमरीका के पीएचडी और कपल्स थेरेपिस्ट स्टीवन स्टोस्नी ने सबसे पहले पहचाना और लिखा। इतना ही नहीं स्टीवन ने ही सबसे पहले इलेक्शन स्ट्रैस डिस्ऑर्डर (Election Stress Disorder) के बारे में भी बताया था। इन मानसिक परेशानियों से पीडि़त व्यक्ति में सामान्य एन्ज़ाएटी, चिंता, डर, असहनशीलता और निम्न स्तर का फ्रस्ट्रे्रशन जैसे लक्षण नजर आते हैं।

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राजनीति में रुचि लेने वालों में ज्यादा
इस साल जून की शुरुआत में जारी किए गए एक प्यू रिसर्च सेंटर के शोध अनुसार, प्रत्येक 10 में से 7 अमरीकियों का मानना है कि उन्हें लगता है कि टीवी पर दिखाए जाने वाले समाचारों की संख्या उपलब्ध समाचारों से भी कम है। जबकि इसके विपरीत, रिपब्लिकन और राइट-विंग की सोच रखने वाले अमरीकियों ने समाचारों को पर्याप्त बताया। सर्वे में रिपब्लिकन के तीन चौथाई की तुलना में डेमोक्रेट्स के 10 में से 10 सदस्यों ने इसके पक्ष में वोट किया। ऐसे ही 2006 से, अमरीकन साइकोलॉजिकल एसोसिएशन (APA) लगातार नियमित रूप से अमरीकियों पर तनाव का सर्वेक्षण कर रही है। आम तौर पर यह पता चला है कि पैसों की कमी, रोजगार और अर्थव्यवस्था अमरीकियों के तनाव के प्रमुख कारणों में से एक थे। एपीए के अनुसार शुरुआती 10वर्षों में सर्वेक्षण में तनाव के स्तर में कमी देखी गई थी। लेकिन 2016 के आखिर से उत्तरार्ध और 2017 की शुरुआत से इस प्रवृत्ति में बदलाव आने लगा। अगस्त, 2017 में एपीए ने चुनाव पर हैरिस पोल सर्वेक्षण शुरू किया। अगले साल जनवरी 2018 में उन्होंने यूएसए के भविष्य, राजनीति, जलवायु और चुनाव के परिणाम पर सवालों के साथ एक दूसरा सर्वेक्षण भी जोड़ा।एपीए ने पाया कि लोगों के तनाव का स्तर बढ़ गया था। आधे से अधिक अमेरिकियों ने बताया कि वर्तमान राजनीतिक माहौल तनाव का एक बड़ा कारण है। दो-तिहाई लोगों ने देश के भविष्य की चिंता को तनाव का कारण बताया और 49 फीसदी ने उन्हें चुनाव परिणाम को लेकर हो रहे तनाव की जानकारी दी। 2017 में किए गए एक अतिरिक्त अध्ययन के अनुसार 59 फीसदी लोगों में रोजगार और काम की उपलब्धता को लेकर जबकि 72 फीसदी उत्तरदाताओं ने कहा कि मीडिया में चल रहीं खबरें उनके तनाव का एक प्रमुख कारण हैं।

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रिश्तों में आ सकता है खिंचाव
कनेक्टिकट में स्थित एक क्लिनिकल मनोवैज्ञानिक एलडी डुकरमे ने बताया कि मैंने कभी लोगों में इतना गुस्सा नहीं देखा। पारिवार में अब लोग सचमुच एक-दूसरे पर चिल्ला रहे हैं और एक-दूसरे को सुनने से भी इनकार कर रहे हैं। परेशानी यह है कि यह मनोविकार डीएसएम में भी शामिल नहीं है। लेकिन हेडलाइन स्ट्रेस डिसऑर्डर आमतौर पर ऐसी स्थिति नहीं है जिसके लिए मरीज को थेरेपी देने की जरुरत हो। हालांकि इससे अनिद्रा, ऊर्जा की कमी, क्रोध, चिड़चिड़ेपन के साथ परिवार के सदस्यों और सहकर्मियों के साथ झगड़े के रूप में भी उभर रहा है। नॉर्थवेस्टर्न विश्वविद्यालय के क्लिनिकल साइकोलॉजिस्ट नैन्सी मोलिटर बताते हैं कि जिन लोगों को हेडलाइन स्ट्रेस डिसऑर्डर है उनमें अक्सर तनाव के लक्षणों दिखाई देने लगते हैं। इसके अलावा पेट में दर्द, सिरदर्द, दांत पीसना और घबराहट के दौरे जैसा पडऩा, उदास या उदास महसूस करना और अभिभूत महसूस करना अन्य लक्षण हैं।

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मानसिक स्वास्थ्य को भी प्रभावित कर रहा
टेक्सास विश्वविद्यालय की मनोविज्ञान की प्रोफेसर मैकनॉटन-कैसल ने 9/11 और भीषण तबाही मचाने वाले तूफानों के बाद लोगों के मानसिक स्वास्थ्य पर मीडिया के प्रभावों का अध्ययन किया है। मैरी का कहना है कि मानव मस्तिष्क आज जितनी जानकारी ग्रहण कर रहा है वह उतनी जानकारी के अनुपात में उतनी ही तेजी से प्रतिक्रिया नहीं दे पा रहा है। हमारा दिमाग सूचनाओं और जानकारियों को वर्गीकृत करना पसंद करता है ताकि हम आसानी से जवाब दे सकें। वास्तव में दुनिया पहले से कहीं बेहतर या बदतर नहीं हुई है। हमेशा असमानता और अन्याय होता रहा है और बहुत से लोग गरीब थे। लेकिन इंटरनेट और मीडिया के नकारात्मक को विज्ञापित करने के दबाव के कारण, हर कोई इसके बारे में जानने लगा है। वहीं सोशल मीडिया आउटलेट्स जैसे फेसबुक पर समान विचारधारा वाले लोगों की ओर रुख करते हुए, अस्थायी समाधान प्रदान कर सकते हैं लेकिन वास्तव में यह कोई समाधान नहीं है। बल्कि यह अक्सर चीजों को बदतर बना देता है। एपीए सर्वेक्षण में पाया गया कि लगभग 10 में से 4 लोगों ने तनाव के कारण सोशल मीडिया पर राजनीतिक और सांस्कृतिक चर्चा में बहस की।

सेहत जिंदगी: क्या ब्रेकिंग न्यूज सुनकर आप को बेचैनी होती है? अगर हां तो यह हो सकता है 'हैडलाइन स्ट्रैस डिस्ऑर्डर'

क्या करें हैडलाइन स्ट्रेस डिसऑर्डर से बचने के लिए
-सोशल मीडिया और टीवी की बेवह की डिबेट से दूर रहें
-सकारात्मक होकरखबर और घटना के हर पहलू पर सोचें
-हेडलाइन स्ट्रेस डिसऑर्डर एक आदत है जिस पर नियंत्रण किया जा सकता है
-काम, सोशल मीडिया, इटरनेट, स्मार्टफोन और न्यूज चैनलोंसे भी ब्रेक लें
-ऐसे काम में मन लगाएं जिसे करना आपको खुशी देता हो
-दोस्तों के साथ फिल्म देखें, मनपसंद संगीत सुनें और अपनी हॉबीज को पूरा करें
-ऐसी बातों पर ध्यान केन्द्रित करें जो नियंत्रण में हों, जिन बातों को बदलना मुमकिन न हो उस पर बेवजह परेशान न हों

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