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न्यू रिसर्च: दुनिया में पहली बार वैज्ञानिकों ने हमारी आंत में ढूंढे 33 हजार अलग वायरस

आज भले ही हम कोरोना वायरस कोविड-19 (Covid-19) से लड़ रहे हों लेकिन इस नए शोध के बारे में जानकर आप हैरान रह जाएंगे कि करीब 33 हजार से ज्यादा वायरस की आबादी हमारी आंत के माइक्रोबायोम में रहते हैं, वो भी हमें नुकसान पहुंचाए। इतना ही नहीं वैज्ञानिकों ने पहली बार इन वायरस को 1000 डेटाबेस कैटलॉग्स में सूचीबद्ध भी किया है। अमरीका की ओहायो स्टेट यूनिवर्सिटी (Ohiyo University) के शोधकर्ताओं ने मानव आंत में निवास करने वाले इन हजारों वायरसों की पहली सूची इसलिए बनाई है क्योंकि शोधकर्ताओं का मानना है कि इतनी बड़ी संख्या में इंसान के किसी एक अंग में वायरस पहली बार पाए गए हैं। वैज्ञानिकों ने इस सूची को 'गट वायरोम डेटाबेस' (Gut Virom Database) नाम दिया है। अध्ययन से यह भी पता चला है कि प्रत्येक व्यक्ति की आंत में पाए जाने वाले ये गट वायरल पॉप्यूलेशन इंसान के फिंगरप्रिंट्स की ही तरह बिल्कुल अलग और विशिष्ठ होते हैं।

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स्वास्थ्य बनाए रखने में अहम भूमिका
हमारी आंत के माइक्रोबायोम में पाए जाने वाले इन विशिष्ठ वायरसों पर शोध बीते कुछ सालों में वैज्ञानिकों के अनुसंधान का एक प्रमुख केंद्र बन गए हैं। ऐसा इसलिए भी है क्योंकि ये वायरस मानव स्वास्थ्य को बनाए रखने में एक महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। हमारे पाचन तंत्र में रहने वाले इन अरबों सूक्ष्म जीवों में अधिकांश जीवाणु हैंं लेकिन गट वायरस आबादी केवल जीवाणु ही नहीं हैं बल्कि इनमें परजीवी (parasites), कवक (fungi) और वायरस (viruses) भी शामिल हैं। वैज्ञानिकों ने इनका पता लगाने के लिए नवीन तकनीकों का सहारा लिया क्योंकि इन अति सूक्ष्म जीवाणुओं को सूचीबद्ध करना आसान नहीं है। जीवाणुओं के विपरीत किसी भी वायरस में यूनीवर्सल जीनोमिक मार्कर (Universal Genomic Marker) की कमी होती है। वास्तव में, 40 से 90 प्रतिशत वायरल जीनोमिक सीक्वेंस को 'वायरल डार्क मैटर' (Viral Dark Matter) के रूप में जाना जाता है जिसका मतलब हुआ कि वे किसी भी ज्ञात रेफरेंस वायरस के अनुक्रम यानी सीक्वेंस के साथ अलाइन नहीं होते हैं। इसलिए शोधकर्ताओं के लिए पहला कदम मानव आंत में वायरस को ढूंढकर दर्जनों पूर्व अध्ययनों से डेटा संकलित करना था। डेटासेट में 16 देशों के करीब 2 हजार लोग शामिल थे।

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मशीन लर्निंग से पहचाने वायरस
शोध के प्रमुख लेखक एन ग्रेगरी ने बताया कि उन्होंने आंत में मौजूद इन अज्ञात वायरसों की पहचान करने के लिए पहले से ज्ञात वायरसों की मदद ली और मशीन लर्निंग (Machine Learning) तकनीक का इस्तेमाल किया। ग्रेगरी ने कहा कि उनकी रुचि केवल इस बात में थी कि हम कितने प्रकार के विषाणुओं को आंत में ढूंढ सकते हैं। इसलिए हमने निर्धारित किया कि हम कितने प्रकार के जीनोम देख सकते हैं। अध्ययन में मशीन लर्निंग एल्गोरिद्म ने आंत केमाइक्रोबायोम में ३३,242 अद्वितीय वायरस की पूरी आबादी को ढूंढ निकाला जिसे बाद में वैज्ञानिकों ने 'गट वायरोम डेटाबेस' के रूप में सूचीबद्ध किया।

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उम्र बढऩे पर घटने लगती है संख्या
शोधकर्ताओं ने अपने इस नए डेटाबेस की प्रभावशीलता को परखने के लिए मिले हुए वायरस के डेटा में पैटर्न की तलाश की। उन्हें शुरू में पता चला कि आंत में पाए गए इन विविध वायरस (जिनके समूह को वायरोम कहते हैं) दरअसल, उम्र बढऩे के साथ ही बढ़ जाती है लेकिन 65 वर्ष की आयु के बाद इसमें गिरावट आने लगती है। यह पैटर्न आंत के जीवाणुओं की आबादी में देखी जाने वाली आयु-संबंधित विविधता के पैटर्न जैसा दिखता है, लेकिन कोई बहुत उल्लेखनीय अपवाद नहीं मिला। हालांकि बड़ों की तुलना में डायसफंक्शनल इम्यून सिस्टम वाले नवजात शिशुओं के पेट में बैक्टीरिया की आबादी की तुलना में वायरस की संख्या ज्यादा मिली।

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ज्यादा वायरस यानी ज्यादा बेहतर स्वास्थ्य
ग्रेगरी का कहना है कि जैसे इकोलॉजी में एक थम्ब रूल है कि प्राकृतिक वातावरण में जितनी ज्यादा उच्च विविधता होगी उतना ही ज्यादा स्वस्थ्य पारिस्थितिकी तंत्र होगा। पेट में पाए गए इन वायरसों के बारे में भी यह नियम लागू होता है। दरअसलआंतम के माइक्रोबायोम में वायरस, जीवाणुओं, परजीवियों और फंगी में जितनी ज्यादा विविधता होगी व्यक्ति उतना ही ज्यादा स्वस्थ्य होगा। शोध में हमने देखा कि स्वस्थ व्यक्तियों में वायरस की अधिक विविधता थी जो यह दर्शाता है कि ये वायरस संभावित रूप से हमारे स्वास्थ्य के लिए बहुत महत्त्वपूर्ण और सकारात्मक भूमिका निभाते हैं।

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इस नए शोध में एक दिलचस्प बात यह है कि जिन कैटलॉगों को सूचीबद्ध किया गया था उनमें से अधिकांश में बैक्टीरियोफेजेज थे यानी वे हानिकारक वायरस और जीवाणुओं पर पलने वाले बैक्टीरिया हें जो शरीर को बीमार करने वाले वायरस को हजम कर जाते हैं। अध्ययन के वरिष्ठ लेखक मैथ्यू सुलिवन का कहना है कि आंत के माइक्रोबायोम में इन बैक्टीरियोफेज और बैक्टीरिया के बीच एक प्रकार का सहजीवी संबंध है। यह नया शोध सेल होस्ट एंड माइक्रोब पत्रिका में प्रकाशित हुआ था।

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